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मुहर्रम में चारों तरफ से आती हैं 'या हुसैन' की सदाएँ

13 Sep 2018

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 इस्लामिक कैलेंडर के प्रथम माह मुहर्रम की शुरुआत हो गई। मुहर्रम माह में पैगम्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्ल. के नवासे हज़रत इमाम हुसैन इस्लाम की रक्षा व हक के लिए शहादत का जाम पी लिया था लेकिन बातिल के सामने झुकना गवारा नहीं किया। मुहर्रम का चाँद नज़र आते ही बुनकर नगरी टाण्डा में या हुसैन की सदाएँ गूँजने लगी तथा चारों तरफ से ढोल नगाड़ों के विशेष धुन सुनाई देने लगी जो अपने आप ही मुहर्रम का एहसास कराने के लिए काफी है।

मुहर्रम माह शिया समुदाय के अतिरिक्त सुन्नी समुदाय के लिए भी विशेष महत्व रखता है। मुहर्रम की दसवीं तारीख को 'आशूरा' कहा जाता है। इस अवसर पर रोजा (उपवास) रखने का विशेष महत्व है। आज चाँद दिखने के कारण मोहर्रम की पहली तारीख बुधवार 12 सितम्बर यानी कल है तथा यौमे आशूरा 21 सितम्बर शुक्रवार को मनाया जाएगा। 
इराक की राजधानी बगदाद से करीब 120 किलोमीटर दूर कर्बला नाम की एक जगह है। इस्लामिक स्कॉलर्स के मुताबिक ये महज किसी शहर का नाम नहीं है बल्कि यहां की मिट्टी गवाह है इस्लामिक तारीख की उस सबसे बड़ी जंग की  जिसमें जुल्म की इंतेहा हो गई। यहां की हवाएं चश्मदीद हैं यजीद के उन पत्थर दिल फरमानों की, जब 6 महीने के अली असगर को पानी तक नहीं पीने दिया गया और उस अत्याचार की, जहां भूख-प्यास से एक मां के सीने का दूध खुश्क हो गया। मुसलमानों का मानना है कि यजीद ने इस्लाम को अपने ढंग से चलाने के लिए लोगों पर तरह तरह के जुल्म किए। यजीद ने खलीफा बनने के लिए इस्लाम के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. के नवासे हजरत इमाम हुसैन को 10वीं मुहर्रम को धोखे से कत्ल कर दिया।  हुसैन की उसी कुर्बानी को याद करते हुए मुहर्रम की 10 तारीख को मुसलमान अलग-अलग तरीकों से दुख जाहिर करते हैं। शिया मुस्लिम अपना खून बहाकर मातम मनाते हैं तो सुन्नी मुस्लिम नमाज, कुरान ख्वानी व रोजा के साथ इबादत करते हैं। 09वीं मुहर्रम को देर रात्रि को ताजिया इमाम चौक पर रखा जाता है जो 10 वीं मुहर्रम को परंपरानुसार अपने निर्धारत मार्गों से होता हुआ समाप्त होता है।



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