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इक दिन की दुल्हन बनी राजधानी-करोड़ों खर्च

22 Feb 2018

लेख साभार:राजीव ठाकुर व फैसल क़ुरैशी लखनऊ

लखनऊ में बुधवार को यूपी सरकार के महाप्रायोजित कार्यक्रम इन्वेस्टर समिट का उद्घाटन पीएम मोदी ने किया। उत्तर प्रदेश में निवेश के दृष्टिकोण से इस आयोजन पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। दो महीने से चल रही तैयारियों के बीच तीन दिन पहले ही सैंकड़ों गुमटियों, ठेलों और पटरी दुकानदारों को उजाड़ दिया गया था और शहर को दुल्हन की तरह सजाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई थी। लाखों गमले, बैनर पोस्टरों के अलावा लाइटों से राजधानी पटी पड़ी थी और एयरपोर्ट से गोमती नगर तक सड़कें ऐसी चमकाई गई थी कि मानो योगी सरकार लड़की की मुंह दिखाई की रस्म अदायगी करने जा रही हो। नई डीएवीपी नीति लागू होने के बाद निश्चित ही इन्वेस्टर समिट के विरोध में कोई अखबार आवाज बुलंद नहीं करेगा पर हकीकत से मुंह फेर कर लोकतंत्र कैसे जिन्दा रह सकता है। 

पुलिस प्रसाशन इस मौके पर चुस्त दुरुस्त नज़र आया और समिट के दौरान जाम इत्यादि से कोई खासी परेशानी नहीं उठानी पड़ी जिसके लिए लखनेश धन्यवाद देता है। एक धन्यवाद आईएएस अधिकारियों को भी जिन्होंने प्रचार प्रसार करने में करोड़ों रुपए सरकार से खींच के जनता में बांट दिए और कुछ दिहाड़ी मजदूर रोजगार पा गए। ताज होटल से लेकर सभी बड़े प्रतिष्ठान दलाली का रामसिक्का हज़म कर रहे है पर साधू की वेशभूषा वाले सन्यासी को ये सब नज़र नहीं आ रहा।
इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में......
स्वागत काउंटर, एलईडी स्क्रीने, शौचालय, भोजन, मुख्य मंच, गड्ढों पर बिछी कालीनों के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा था जिसके कारण करोड़ों की समिट में व्यवस्थाएं समिटी हुई नज़र आ रही थी। छोटी से छोटी खामी को ये कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि बड़े आयोजनों में ऐसा होता ही रहता है क्योंकि यह कार्यक्रम एक सरकार का महत्त्वकांक्षी प्रायोजन था और जिसकी निगहबानी तमाम आईएएस अधिकारियों के साथ साथ स्वयं मुख्यमंत्री कर रहे थे। और भद्द तो तब पिट गई जब बहुप्रचारित कंटूपुरवा का बटन योगी जी दबाते रह गए पर वो पठ्ठा हिल के भी ना दिया, सारे कैमरे उस समय मोदी और योगी के खिसियाने चेहरे दिखाते हुए मानों उत्तर प्रदेश को मुंह चिढ़ा रहे थे। हजारों करोड़ रुपए के एएमयू साइन किए गए पर प्रदेश और राजधानी में बंद पड़े कारखानों और उद्योगों को पुनर्जीवित करने की बात तक किसी के दिमाग में नहीं आई। हो सकता है कि इसमें तमाम कानूनी अड़चनें आड़े आती हो पर लाखों लोगों का भविष्य इन बंद पड़ी फैक्ट्रियों में गिरफ्तार पड़ा है।
एक दिन की दुल्हन बना कर लखनऊ को अच्छी तरह सजाया संवारा गया पर क्या वास्तव में ये तथाकथित निवेश प्रदेश को मिलेंगे ? जीएसटी की उलझनों को छोड़ भी दे तो भी यूपी में निवेश के हालात बनाने के लिए योगी जी को अवश्य ही अफसरशाही के उस मकड़जाल से बचना ही होगा जो आज भी अंग्रेजी पॉलिसी पर चलते हुए विकास को बाधित और विधायिका को बंधक बना कर रखते हैं। पूर्व सांसद व वरिष्ठ भाजपा नेता के तथाकथित रिश्तेदार इस सरकार में भी धीरे धीरे पकड़ बनाते हुए आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि उनकी ना केवल लम्बाई सबसे अधिक है बल्कि उनका कद भी बहुत बड़ा हो गया है। परिवहन, बिजली, पानी जैसी आधारभूत संरचनाएं अभी प्रदेश से मीलों दूर है और कानून व्यवस्था अपने आप में बड़ी चुनौती बनी हुई है तो ऐसे में बड़े पैमाने पर निवेश आ जाने की बात ऐसी लगती है जैसे अपनी पीठ खुद ही थपथपाना ! साफ तौर पर इस आयोजन का आधार आगामी लोकसभा चुनाव हैं जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है पर जनता की गाढ़ी कमाई फूंक कर जनता को ही सब्जबाग दिखाना कभी भी लोकतंत्र में दलगत हितकारी नहीं रहा है। बाद में बात बिगड़ जाने पर डैमेज कंट्रोल करने की कला अभी भी अखिलेश यादव सीख रहे होंगे पर भाजपा ने सत्ता खोने के अनुभवों से कुछ सीखा है, ऐसा लग नहीं रहा है। एंटी रोमियो अभियान, बूचडखाने बन्द, कानून व्यवस्था की दुहाई, गढ्ढा मुक्त सड़कें, रोजगार, धार्मिक दंगे फसाद जैसे कई मीटरों को खुद ही गढ़ कर खुद ही फ्लाप करने के बाद भी पीएमओ और सुनील बंसल जैसे कद्दावरों को भले ही इमेज और ईगो की प्राब्लम हो पर कदाचित उनको इस मुगालते में नहीं जीना चाहिए कि योगी की डोर हमेशा ही वो खींच कर रख सकेंगे। पांच बार के सांसद और अब मुख्यमंत्री के पास गोरक्षपीठ की बड़ी विरासत होने के साथ साथ ईमानदाराना छवि भी है जिसके लिए वह कभी भी दांव खेलना नहीं चाहेंगे। ए मौंक हू बिकेम चीफ मिनिस्टर कभी भी पीठाधीश्वर से कम की इमेज का एएमयू साइन नहीं करेगा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ दिनों का प्रवास कर रहे योगी और राजनाथ यदि नरो के इंद्र की जगह नर नारी में इंद्र खोजने की पहल करने की सोच भी लेंगे तो उत्तर प्रदेश का कायाकल्प हो जाएगा और फिर कहीं से निवेश लाना नहीं पड़ेगा बल्कि और लोग हमें अतिथि बना कर आमंत्रित करेंगे।
जिस मानवता और हिंदूवाद की दुहाई दे कर रामराज्य लाने की बातें की गई थी वो सचमुच लुभाने स्वपन थे जिनका धरातल से कोई वास्ता ना था और ना कभी होगा। जनता की नब्ज टटोल कर उसे सही दवाई देने की जगह नशे का इंजेक्शन लगाने वाले फिरकापरस्त भले ही कुछ समय के लिए कितने भी ताकतवर बन ले पर.... पर ये पब्लिक है बाबू.... और... और ये सब जानती है। इसको लिखने के बाद मुझे विरोध की एक आंधी का सामना करना है जिसके लिए मैं तैयार हूं पर मितरों व प्यारे भाइयों-बहनों इस लेख के पीछे किसी राजनैतिक दल की हिमायत या विरोध नहीं है पर फिर भी आपकी जैसी मर्जी। बुरा मानोगे तभी मनेगी होली।



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